वाराणसी: भारत का सबसे प्राचीन शहर
भाग 1: प्रस्तावना
काशी, जिसे आज हम वाराणसी या बनारस के नाम से जानते हैं, भारत की सबसे प्राचीन और जीवित नगरी है। यह नगरी केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक चेतना है — जहाँ मृत्यु भी मोक्ष बन जाती है और जीवन एक उत्सव।
वाराणसी का नाम दो नदियों — ‘वरुणा’ और ‘असि’ — के नाम पर पड़ा है। यह नगर गंगा के तट पर बसा हुआ है और इसकी सभ्यता हजारों वर्षों से निर्बाध रूप से चली आ रही है। यहाँ का हर घाट, हर गली, हर मंदिर इतिहास, भक्ति और दर्शन से जुड़ा है।
इस लेख में हम जानेंगे:
- वाराणसी का इतिहास और धार्मिक महत्व
- प्रमुख घाट और मंदिर
- सारनाथ और बौद्ध परंपरा
- संस्कृति, भाषा, संगीत और शिक्षा
- और अंत में — काशी क्यों एक अनुभव है, सिर्फ़ एक शहर नहीं
“काशी में जो है, वह कहीं और नहीं — न काल में, न स्थान में।”
भाग 2: प्राचीन इतिहास — वैदिक युग से आधुनिक काल तक
1. वैदिक काल और प्रारंभिक साक्ष्य
वाराणसी का इतिहास इतना प्राचीन है कि यह भारत की सभ्यता के साथ-साथ विकसित हुआ। ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है — एक समृद्ध, ज्ञान-प्रधान क्षेत्र के रूप में। ‘कासी’ जनपद प्राचीन १६ महाजनपदों में से एक था। उस समय यह नगर वाणिज्य, कृषि, विद्या और दर्शन का केंद्र था।
“काश्यश्च नरेशः” — महाभारत
2. रामायण और महाभारत में काशी
📖 रामायण में: कहा गया है कि यह नगर शिव का प्रिय स्थल था। शिव और पार्वती की कई कथाएं काशी से जुड़ी हैं।
📖 महाभारत में: काशी नरेश की पुत्रियाँ — अंबा, अंबिका और अंबालिका — का अपहरण भीष्म द्वारा किया गया था। यह कथा राजनीति और नारी के अधिकारों के ऐतिहासिक विमर्श को दर्शाती है।
3. बुद्ध और बौद्ध युग (6वीं सदी ईसा पूर्व)
काशी बौद्ध धर्म का प्रारंभिक केंद्र बना। सिद्धार्थ गौतम ने बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश यहीं सारनाथ में दिया जिसे कहते हैं: “धर्मचक्र प्रवर्तन”।
- धामेक स्तूप
- अशोक स्तंभ (सिंहचतुर्मुख) — भारत का राष्ट्रीय प्रतीक
- मूलगंध कुटी विहार
4. जैन परंपरा में काशी
जैन धर्म के २३वें तीर्थंकर — पार्श्वनाथ जी का जन्म वाराणसी में हुआ था। यहाँ जैन मंदिरों की एक श्रृंखला है — जो इस नगर के धार्मिक समावेश को दर्शाती है।
5. मौर्य, शुंग और गुप्त युग (321 BCE – 550 CE)
सम्राट अशोक ने सारनाथ में स्तूप, विहार और शिलालेख स्थापित करवाए। गुप्त युग में वाराणसी शिक्षा, कला, संस्कृति और धर्म का महान केंद्र बना। इस काल में संस्कृत साहित्य, खगोलशास्त्र, ज्योतिष, और शिल्पकला फली-फूली।
6. पाल और सेंगर राजवंश (8वीं–11वीं सदी)
पाल शासकों ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। काशी में कई महाविहार और ध्यानकेंद्र बनवाए गए। इस समय ‘नालंदा’ और ‘काशी’ की विद्या शाखाएं समानांतर मानी जाती थीं।
7. मुस्लिम काल: आक्रमण और पुनर्निर्माण (12वीं सदी के बाद)
महमूद ग़ज़नी और उसके बाद के आक्रमणों में कई मंदिर नष्ट किए गए। औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर के स्थान पर मस्जिद बनवाई (ज्ञानवापी परिसर)। इसके बाद भी श्रद्धालुओं ने छोटे मंदिरों और घरों में पूजा जारी रखी।
📌 अहिल्याबाई होल्कर (1765) ने वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
8. आधुनिक काल: स्वतंत्रता आंदोलन और काशी नरेश
काशी नरेश चेत सिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया, जो बाद में बनारस राज्य बना। बनारस १८५७ के विद्रोह और स्वतंत्रता आंदोलन का विचार केंद्र रहा।
9. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) और आधुनिक पुनर्जागरण
1916 में पं. मदन मोहन मालवीय द्वारा BHU की स्थापना हुई। यह संस्था काशी को एक बार फिर ज्ञान, विज्ञान और संस्कृति के केंद्र के रूप में स्थापित करती है।
भाग 3: घाट — धर्म, दर्शन और जीवन की अनोखी परंपरा
1. घाटों का महत्व: कर्मभूमि और मोक्षभूमि
वाराणसी के घाट केवल सीढ़ियाँ नहीं हैं जो नदी तक पहुँचती हैं — ये वे स्थल हैं जहाँ जीवन, धर्म, दर्शन और मृत्यु एक साथ विद्यमान रहते हैं। यहाँ करीब 84 प्रमुख घाट हैं, जिनमें प्रत्येक का अपना इतिहास, मान्यता और प्रयोजन है। इन घाटों पर लोग स्नान, ध्यान, पूजा, तर्पण, जप, संगीत, समाधि — सभी करते हैं। यह भी माना जाता है कि इन घाटों पर किया गया अंतिम संस्कार आत्मा को मोक्ष प्रदान करता है।
2. प्रमुख घाटों का विवरण
- दशाश्वमेध घाट: सबसे प्रसिद्ध और प्रमुख घाट। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ किए थे। यहाँ प्रतिदिन संध्या को होने वाली गंगा आरती विश्वविख्यात है।
- मणिकर्णिका घाट: मोक्षदायिनी घाट — यहाँ अंतिम संस्कार होता है। भगवान शिव यहाँ मृत्यु के समय लोगों के कान में ‘तारक मंत्र’ बोलते हैं।
- हरिश्चंद्र घाट: राजा हरिश्चंद्र की सत्य-निष्ठा से जुड़ा घाट। यहाँ भी शव-संस्कार होता है।
- अस्सी घाट: दक्षिणी छोर का प्रमुख घाट, असी नदी यहीं गंगा में मिलती है। यह युवाओं और पर्यटकों में लोकप्रिय है।
- पंचगंगा घाट: पाँच पवित्र नदियाँ यहाँ मिलती मानी जाती हैं — गंगा, यमुना, सरस्वती, किरणा और धुतपापा।
3. अन्य प्रमुख घाट
| घाट का नाम | विशेषता |
|---|---|
| केदार घाट | दक्षिण भारतीय शैली में शिव मंदिर |
| राजेंद्र प्रसाद घाट | स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर |
| चेतसिंह घाट | चेत सिंह किला एवं संघर्ष की स्मृति |
| दरभंगा घाट | भव्य स्थापत्य और फोटोप्रिय स्थल |
| सिंधिया घाट | झुका हुआ मंदिर, आंशिक रूप से डूबा हुआ |
| तुलसी घाट | तुलसीदास द्वारा रामलीला आयोजन स्थल |
4. घाटों का सांस्कृतिक और सामाजिक आयाम
घाटों पर शहनाई, तबला, वीणा, और भजन की ध्वनि आज भी गूंजती है। संकटमोचन संगीत समारोह की जड़ें घाटों से जुड़ी हैं।
त्योहार: देव दीपावली पर घाटों पर लाखों दीप प्रज्ज्वलित होते हैं। गंगा दशहरा, छठ पूजा, गंगा आरती — सबका मुख्य मंच घाट ही हैं।
साहित्य और कला: कबीर, तुलसी, रविदास — सभी ने घाटों को अपने लेखन का आधार बनाया।
5. घाटों का दार्शनिक पक्ष
घाट जीवन के उतार-चढ़ाव, जन्म-मृत्यु, स्नान-तर्पण, ज्ञान-त्याग — इन सभी को एक मंच पर रखते हैं। यहाँ जीवन का प्रारंभ (मुंडन, संस्कार) और अंत (शव-संस्कार) दोनों होते हैं।
“घाट पर बैठकर ही जीवन के गहरे अर्थ समझ में आते हैं।”
भाग 4: मंदिर — श्रद्धा, स्थापत्य और आत्मा का केंद्र
1. वाराणसी: मंदिरों का नगर
वाराणसी को “मंदिरों का नगर” कहा जाता है। यहाँ हजारों मंदिर हैं — छोटे-बड़े, प्राचीन और पुनर्निर्मित। इन मंदिरों की दीवारों में सिर्फ़ पत्थर नहीं, बल्कि हज़ारों वर्षों की आस्था, शास्त्र, परंपरा और आत्मा समाहित है। हर मंदिर का अपना इतिहास है, अपनी कथा है, और अपनी ऊर्जा।
2. काशी विश्वनाथ मंदिर: ज्योतिर्लिंगों में सर्वोपरि
यह मंदिर १२ ज्योतिर्लिंगों में से एक है और काशी का सबसे पवित्र केंद्र है। मान्यता: स्वयं भगवान शिव यहाँ ‘विश्व के स्वामी’ रूप में प्रतिष्ठित हैं।
- मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1777 में अहिल्याबाई होल्कर द्वारा बनवाया गया।
- महाराजा रणजीत सिंह ने शिखर को शुद्ध सोने से मढ़वाया।
“काश्यां मरणं मुक्तिः” — जो काशी में शिव के चरणों में मृत्यु को प्राप्त करता है, वह पुनर्जन्म से मुक्त होता है।
3. काल भैरव मंदिर: काशी का कोतवाल
काल भैरव को काशी का ‘रक्षक’ या ‘कोतवाल’ कहा जाता है। मान्यता है कि बिना काल भैरव की अनुमति कोई काशी में स्थायी नहीं रह सकता। दर्शन के समय विशेष प्रकार का काला धागा बंधवाया जाता है।
4. संकटमोचन हनुमान मंदिर
यह मंदिर भक्त गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित किया गया था। यहाँ हनुमान जी की मूर्ति स्वयंभू मानी जाती है। हर वर्ष यहाँ संकटमोचन संगीत समारोह होता है।
5. अन्नपूर्णा मंदिर
माँ अन्नपूर्णा को भोजन और समृद्धि की देवी माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव ने उनसे भिक्षा ली थी। यहाँ हर दिन नि:शुल्क अन्नदान होता है।
6. दुर्गा कुंड मंदिर
माँ दुर्गा का यह मंदिर 18वीं सदी में बनवाया गया। इसके पास एक विशाल कुंड (तालाब) है। शक्ति उपासना की परंपरा इस मंदिर से गहराई से जुड़ी है।
7. तुलसी मानस मंदिर
यह मंदिर वहाँ बना है जहाँ गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की थी। मंदिर की दीवारों पर रामचरितमानस के दोहे खुदे हुए हैं।
8. विशालाक्षी मंदिर — शक्तिपीठ
यह मंदिर ५१ शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि माँ सती की कुंडली यहाँ गिरी थी। यह स्थल शक्ति उपासकों के लिए अत्यंत पवित्र है।
9. अन्य प्रमुख मंदिर
| मंदिर | विशेषता |
|---|---|
| नागेश्वर मंदिर | नागराज की उपासना |
| भैरवनाथ मंदिर | तांत्रिक साधना का केंद्र |
| लक्ष्मी नारायण मंदिर | वैष्णव परंपरा |
| कामेश्वर महादेव | दुर्लभ लिंग रूप |
10. मंदिर विध्वंस और पुनर्निर्माण का इतिहास
मुस्लिम शासन, विशेषकर औरंगज़ेब के काल में अनेक मंदिरों को नष्ट कर मस्जिदें बनाई गईं। परंतु श्रद्धालुओं ने घरों में, गुप्त स्थानों पर पूजा जारी रखी। अहिल्याबाई होल्कर, रणजीत सिंह, काशी नरेश जैसे भक्तों ने मंदिरों का पुनर्निर्माण करवाया।
काशी के मंदिर केवल ईंट और पत्थर नहीं — वे शिव की चेतना, शक्ति की अनुभूति, और भक्ति की अभिव्यक्ति हैं।
भाग 5: सारनाथ — बौद्ध धर्म की जन्मस्थली और वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र
1. सारनाथ: काशी का आध्यात्मिक विस्तार
सारनाथ वाराणसी से लगभग 10 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह वही स्थान है जहाँ सिद्धार्थ गौतम ने बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद अपना पहला उपदेश दिया — जिसे कहा जाता है:
“धर्मचक्र प्रवर्तन” — यानि धर्म का पहिया चलाना।यह स्थल न केवल बौद्ध धर्म का केंद्र है, बल्कि यह दर्शाता है कि वाराणसी केवल हिन्दू परंपरा ही नहीं, बल्कि वैश्विक अध्यात्म की भूमि भी है।
2. बुद्ध की प्रथम संगति और संघ की स्थापना
बुद्ध ने पाँच संन्यासियों (पंचवर्गीय भिक्षुओं) को ज्ञान दिया: कौण्डिन्य, वप्प, भद्दिय, महानाम, अस्सजि। यहीं बौद्ध संघ की स्थापना हुई — जिससे बौद्ध धर्म का पहला अनुशासित समुदाय बना।
🔆 यह घटना “आषाढ़ पूर्णिमा” के रूप में आज भी मनाई जाती है।
3. प्रमुख स्थल — स्तूप, विहार और संग्रहालय
- धामेक स्तूप: लगभग 34 मीटर ऊँचा स्तूप, 6वीं सदी में बना। यहीं बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था।
- चौखंडी स्तूप: जहाँ बुद्ध अपने पंचवर्गीय शिष्यों से पहली बार मिले थे। मुग़ल काल में इसमें एक अष्टकोणीय मीनार जोड़ी गई।
- मूलगंध कुटी विहार: श्रीलंका द्वारा निर्मित विहार। बुद्ध की विशाल मूर्ति और अंदर जेतवन विहार जैसे चित्र।
- सारनाथ संग्रहालय: यहाँ अशोक स्तंभ का सिंहचतुर्मुख शीर्ष रखा गया है — जो भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।
4. अशोक का बौद्ध धर्म में योगदान
सम्राट अशोक (3री सदी ईसा पूर्व) ने सारनाथ को भव्य स्तूपों और विहारों से सजाया। उन्होंने यहाँ धम्म (धर्म) लेख खुदवाए — जो धर्म और अहिंसा के सिद्धांतों को प्रचारित करते हैं।
“सब प्राणी प्रिय हैं, किसी को कष्ट मत दो” — अशोक का संदेश
5. बौद्ध धर्म की शाखाएँ और अंतरराष्ट्रीय योगदान
सारनाथ केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। यहाँ कई देशों ने अपने विहार और स्तूप बनवाए हैं:
| देश | प्रमुख स्थल |
|---|---|
| श्रीलंका | मूलगंध कुटी विहार |
| जापान | जापानी मंदिर, शांति स्तूप |
| थाईलैंड | थाई मंदिर और बुद्ध प्रतिमा |
| तिब्बत | तिब्बती बौद्ध विहार, कालचक्र चित्रण |
6. बौद्ध शिक्षाओं का सार जो यहीं उद्घोषित हुआ
आर्य सत्य (Four Noble Truths):
- दुःख है
- दुःख का कारण है
- दुःख का अंत संभव है
- दुःख-निवारण का मार्ग है — आष्टांगिक मार्ग
📚 सारनाथ शांति, करुणा और ध्यान की ऊर्जा से भरा एक जीवंत केन्द्र है।
भाग 6: काशी की संस्कृति, भाषा और साहित्य
1. सांस्कृतिक विविधता और गंगा-जमुनी तहज़ीब
वाराणसी एक साथ कई परंपराओं, जातियों और धर्मों की सांझा संस्कृति को जीता है। यहाँ हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों की कला, संगीत, खानपान और भाषा ने अनोखा ‘गंगा-जमुनी’ रंग गढ़ा है। मुहर्रम से लेकर रामलीला, ईद से लेकर दीपावली — सबका उत्सव एक साथ मनाया जाता है।
2. बोलियाँ और भाषाएँ
काशी में बोली जाने वाली भाषा ‘काशी बोली’ है, जो भोजपुरी और अवधी के मिश्रण से बनी है।
🔹 उदाहरण: “का हो पंडिजी! चाय पीयल जाव?”
इसके साथ ही हिंदी, उर्दू, संस्कृत भी बड़े स्तर पर प्रचलित हैं।
3. साहित्यिक परंपरा: संतों की भूमि
काशी संतों और कवियों की धरती रही है।
📜 कबीर: निर्गुण भक्ति के अग्रदूत — “सांच कहो तो मारन धावे।”
📜 तुलसीदास: रामचरितमानस की रचना की — “भवसागर तरै बिनु रामहि जपै।”
📜 भोजपुरी कवि भिखारी ठाकुर: ‘भोजपुरी शेक्सपियर’ — बिदेसिया, गबर घिचोर जैसे लोकनाट्य।
4. संगीत और नृत्य
काशी बनारस घराने का केंद्र है। यह शास्त्रीय संगीत की तीन विधाओं — गायन, वादन और नृत्य — का महागृह है।
- उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ — शहनाई का पर्याय, काशी का गौरव।
- पंडित किशन महाराज — तबला वादन में अद्वितीय।
- पंडित राजन-साजन मिश्र — बनारस घराने के ख्यात गायक।
यहाँ हर घाट पर रियाज़ होता है, हर मंदिर में भजन गूंजता है और हर गली से संगीत झलकता है। संकटमोचन संगीत समारोह इसकी सबसे सुंदर मिसाल है।
5. चित्रकला और हस्तशिल्प
- बनारसी साड़ी — विश्व प्रसिद्ध, रेशमी और जरी कढ़ाई से युक्त।
- गुलाबी मीनाकारी — आभूषणों में अनूठी बनारसी कला।
- लकड़ी की खिलौने और पीतल की मूर्तियाँ
6. लोक परंपराएँ और मेले
रामनगर की रामलीला, नक्खीघाट का नाटक, गंगा महोत्सव, नाग नथैया, और देव दीपावली जैसे आयोजन काशी की सांस्कृतिक आत्मा को जीवंत बनाए रखते हैं।
“काशी की संस्कृति — ना केवल परंपरा, बल्कि जीवित अनुभव है।”
भाग 7: शिक्षा, विश्वविद्यालय और आधुनिक संस्थाएँ
1. बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)
BHU की स्थापना 1916 में पं. मदन मोहन मालवीय ने की थी। यह एशिया के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक है। यह विज्ञान, कला, आयुर्वेद, संगीत, और धर्मशास्त्र जैसे विविध विषयों में शिक्षा देता है।
- विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थित नया मंदिर — छात्रों के लिए ध्यानस्थल
- भारतीय विद्या भवन, महिला महाविद्यालय, आयुर्वेद संकाय जैसे प्रमुख विभाग
- भारत रत्न पं. मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा
2. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय
यह विश्वविद्यालय संस्कृत और वेदों की शिक्षा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। काशी में शास्त्रों की परंपरा को संरक्षित और संवर्धित करता है। इसकी स्थापना 1791 में हुई थी।
3. केंद्रीय तिब्बती संस्थान
बौद्ध धर्म और तिब्बती भाषा-संस्कृति के संरक्षण हेतु स्थापित यह संस्थान तिब्बतियों के साथ-साथ भारतीय विद्यार्थियों को भी बौद्ध दर्शन में प्रशिक्षित करता है।
4. कला और संगीत संस्थान
बनारस घराने की परंपरा को सहेजने के लिए कई संस्थान कार्यरत हैं:
- कला संकाय, BHU
- संगीत नाटक अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त निजी विद्यालय
- संकटमोचन संगीत पीठ
5. शोध और नवाचार
BHU में विज्ञान, कृषि, चिकित्सा, और तकनीकी के क्षेत्र में कई अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र हैं:
- आईआईटी (BHU) — इंजीनियरिंग और नवाचार का केंद्र
- इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (IMS-BHU)
- रीजनल कैंसर सेंटर
“काशी — जहाँ प्राचीनता और आधुनिकता एक साथ गूंजती हैं।”
भाग 8: समापन — काशी एक अनुभव
काशी केवल एक शहर नहीं, एक जीवित चेतना है। यहाँ जीवन की शुरुआत भी होती है और मोक्ष भी मिलता है। हर पत्थर में कथा है, हर गली में गीत है, और हर घाट पर दर्शन है। काशी में समय ठहरता नहीं — वह प्रवाहित होता है जैसे गंगा।
बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद, घाटों की शांति, सारनाथ की करुणा, बनारस की चाय, पान और ठिठोली — ये सब मिलकर बनाते हैं एक ऐसा अनुभव जिसे शब्दों में बांधना असंभव है।
“काशी में एक दिन बिताना जीवन की पूर्णता का एहसास कराता है।”
यदि आपने काशी को नहीं देखा, तो भारत का हृदय अधूरा रह गया। आइए एक बार काशी को नमन करें — जहाँ मृत्यु भी उत्सव बन जाती है और जीवन एक पूजा।